त्याग –  Hindi Kahani
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त्याग –  Hindi Kahani

त्याग  Hindi Kahani

सन् 1527 में चित्तौड़ (राजस्थान) में एक अनोखी घटना घटी। (त्याग)

चित्तौड़ के महाराणा साँगा की मृत्यु हो गयी। उनकी एकमात्र सन्तान उदयसिंह की आयु उस समय बहुत कम थी। इसलिए उसे राजा नहीं बनाया जा सका। उसका पालन-पोषण किया एक राजपूतनी धाय ने। उसका नाम था पन्ना।

महाराणा साँगा का भतीजा बनवीर चित्तौड़ का राज्य हथियाना चाहता था। उदयसिंह के जीते-जी उसकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकती थी, क्योंकि वही राज्य का उत्तराधिकारी था।

एक शाम पन्ना को पता चला कि रात में आकर बनवीर उदयसिंह की हत्या करना चाहता है। अब वह क्या करे! कैसे उदयसिंह के प्राणों की रक्षा करे! उसने कुछ देर तक सोचा; फिर मन-ही-मन कुछ करने की ठान ली।

शाम को उदयसिंह खेल कर महल में आये। बहाना बना कर पन्ना ने उन्हें उनकी शय्या पर न लिटा कर किसी दूसरे कमरे में लिटा दिया। उदयसिंह की शय्या पर उसने अपने पुत्र चन्दन को सुला दिया। सुलाने के बाद उसे भली प्रकार चादर से ढक दिया।

थोड़ी देर बाद बनवीर हाथ में नंगी तलवार लिये हुए आया और गरज कर बोला- “कहाँ है उदयसिंह?”

पन्ना ने उदयसिंह की शय्या की ओर संकेत कर दिया। शय्या के पास पहुँच कर बनवीर ने तलवार से भरपूर वार किया। रक्त की धारा बह निकली।

अपना काम करके बनवीर चला गया। और, पन्ना की आँखों के सामने ही चला गया उसका प्यारा-दुलारा चन्दन भी, भगवान् के पास।

अब तक अपने आँसुओं को रोके रखने वाली पन्ना फूट-फूट कर रोयी-खूब रोयी। जब रोते-रोते आँसू सूख गये तो उठी और जूठी पत्तलें उताने वाले सेवक को बुला लायी। एक टोकरी में सोये हए उदयसिंह को लिटाया और ऊपर से जूठी पत्तले भर दीं। सेवक उस टोकरी को अपने शिर पर उठा कर बेरिस नदी के किनारे एक सुरक्षित स्थान पर रख आया जहाँ से उन्हें उनके ननिहाल पहुँचा दिया गया।

बच्चो! कैसी लगी तुम्हें पन्ना धाय की यह कहानी? अपने ही हाथों अपने पुत्र को मृत्यु के मुँह में ढकेलने वाली अभागिन पन्ना! नहीं, वह अभागिन नहीं थी। वह धरती की समस्त माताओं से श्रेष्ठ माता थी। वह जानती थी कि चित्तौड़ के राजवंश की रक्षा करने के लिए उसे उदयसिंह की रक्षा करनी होगी। उसकी रक्षा उसने की; लेकिन इसके लिए उसने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान कर दिया। यह कोई साधारण बलिदान नहीं था।

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आज साढ़े चार सौ साल से अधिक समय बीत जाने पर भी पन्ना को कौन भूल पाया है? तुम्हें भी लोग कभी न भूल पायें, तो कितना अच्छा हो! इसके लिए तम्हें एक संकल्प लेना होगा-जब दूसरों के हित में कुछ कर दिखाने का अवसर मिले, तब पन्ना धाय को याद कर लेना

और अपनी प्रिय-से-प्रिय वस्तु का भी त्याग करने में पीछे न रहना। देश की, समाज की और दूसरों की सेवा करने के लिए अपनों का त्याग करना ही पड़ता है।

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