पुरुषार्थ - भारतीय इतिहास की एक घटना
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पुरुषार्थ – भारतीय इतिहास की एक घटना

पुरुषार्थ भारतीय इतिहास की एक घटना

दो राज्यों के शासकों के बीच युद्ध की तैयारियाँ हो रही थीं। दोनों ही शासक एक सन्त के भक्त थे। दोनों ही उस सन्त के पास अलग-अलग समय में विजय का आशीर्वाद माँगने गये। (पुरुषार्थ)

एक शासक उस सन्त के पास पहुँचा। सन्त ने आँखें बन्द करके भगवान् से कुछ पूछा। फिर उस शासक से कहा- “तुम्हारी विजय होगी।”

दूसरा शासक भी उस सन्त के पास पहुँचा। सन्त ने फिर भगवान् से बातें की और उस शासक को बतलाया- “तुम्हारी विजय सन्दिग्ध है।”

दूसरा शासक निराश नहीं हुआ। उसने अपने सेनापति से कहा- “हमारी विजय का कोई भरोसा नहीं है; लेकिन इससे क्या! हम अन्तिम क्षण तक लड़ेंगे। जोर-शोर से तैयारी करो। जो होगा, वह देखा जायेगा। रण की देवी यदि हमारे जीवन की बलि माँगती है, तो हम देंगे।”

पहले शासक की प्रसन्नता का ठिकाना न था। उसके पैर धरती पर पड़ते ही न थे। उसकी विजय निश्चित हो चुकी थी। उसने युद्ध की बात सोचना बन्द कर दिया। वह आमोद-प्रमोद में मस्त हो गया। उसके सैनिक भी रंगरलियाँ मनाने लगे। वे भूल ही गये कि युद्ध होना है।

एक दिन जुझाऊ बाजे बजने लगे। दोनों ओर के सैनिक आमने-सामने आ खड़े हुए। युद्ध शुरू हो गया। जिन सैनिकों की विजय निश्चित थी, उन्हें किसी प्रकार की चिन्ता ही न थी। उनके ऊपर सन्त का आशीर्वाद जो था!

एकाएक उन्होंने देखा कि रण-क्षेत्र में शत्रुपक्ष की तरफ एक सफेद बैल प्रकट हो गया। बड़ा भयानक बैल था—बड़ी-बडी सीमें। अडारों की तरह चमकती आँखें, भारी-भरकम शरीर। वेग के साथ ही हिलाता हआ बैल विजय की प्रसन्नता में झूम रहे सैनिको के बीच घुस आया।

वे सैनिक युद्ध करने की मनःस्थिति में नहीं थे। उन्होंने युद्ध करने की तैयारी ही नहीं की थी। संख्या में वे थोड़े थे। थोड़े-से ही अस्त्र-शस उनके पास थे।

बैल ने उन निश्चिन्त सैनिकों के बीच प्रलय मचा दी। वे धराशायी होने लगे। दसरे पक्ष के सैनिकों का हौसला बढ़ा। प्राणों को निछावर करने की तैयारी किये हए उन सैनिकों का मनोबल पहले से ही ऊँचा था। उस बैल ने उनका मनोबल और भी ऊँचा कर दिया। वे भी प्रलय मचाने लगे।

‘सन्त का आशीर्वाद प्राप्त करने वाला शासक पराजित हआ।। पराजय का अभिशाप स्वीकार करने वाला शासक जीत गया।

हारा हुआ शासक सन्त के पास पहुँचा और कहने लगा-“यह आपने कैसा आशीर्वाद दिया!”

सन्त ने आँखें बन्द करके कुछ देर तक भगवान् से बातें की। फिर आँखें खोल कर वह बोले- “वत्स, तुम्हारी विजय और तुम्हारे शत्रु की पराजय बिलकुल निश्चित थी। लेकिन तुम अपने भाग्य पर भरोसा करके बैठ गये। तुम्हारे शत्रु ने अपने पुरुषार्थ पर भरोसा किया।

अपनी पराजय की बात जानते हुए भी उसके सैनिकों ने युद्ध के लिए अपने को तैयार किया। इसीलिए भगवान् को बैल का रूप धारण करके उसकी सहायता करनी पड़ी। तुम्हें पुरुषार्थ करने को किसने मना किया था?’

शासक क्या उत्तर देता! वह शिर नीचा किये खड़ा रहा।

बच्चो. जो परुषार्थ करता है, वह अपने भाग्य की रेखाएँ भी बदल सकता है। जो पुरुषार्थ करता है, भाग्य उसी का साथ देता है। पुरुषार्थहीन व्यक्ति का भाग्य दुर्भाग्य में बदल जाता है।

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