राम भरत बनना, कौरव नहीं - हिंदी कहानी
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राम भरत बनना, कौरव नहीं – हिंदी कहानी

राम भरत बनना, कौरव नहींहिंदी कहानी

रामायण की घटना है। भगवान् राम वनवासी हो गये। भरत ने सुना कि उन्हीं के कारण भगवान् को वन जाना पड़ा, तो अपने को धिक्कारते हुए उनसे मिलने चल दिये। (राम भरत बनना)

भगवान् के चरणों पर गिर कर रोते हुए भरत बोले-“नाथ, अयोध्या का राज्य आपका ही है। मैंने सपने में भी उस राज्य को पाने के लिए सोचा हो तो मेरी बुरी से बुरी गति हो। आप राजसिंहासन पर बैठे। मैं आपके बदले वनवास कर लँगा।”

भगवान् राम ने बहुत प्यार से कहा- “भरत, माता-पिता की आज्ञा मान कर तुम राज्य सँभालो; माता-पिता की आज्ञा मान कर मैं जंगल में।

“लेकिन, राज्य पर तो आपका अधिकार है।”— भरत ने विनयपूर्वक कहा।

दोस्तों, हम-तुम छोटी-छोटी चीजें पाने के लिए लड़ने पर उतारू हो जाते हैं। भगवान और भरत एक-दूसरे को राज्य का अधिकार देने के लि उतावले हो रहे थे। वनवासी भगवान् राम भरत को अयोध्या के राजसिंहासन पर बिठला रहे थे। भरत भगवान् राम के बदले जंगल में रहने के लिए तैयार थे। कितना अनूठा लेन-देन! कितनी मीठी बात!

मित्रो, कभी लड़ना हो तो ‘देने’ के लिए लड़ना; ‘पाने’ के लिए न लड़ना। राम-भरत बन कर देने के लिए उतावले हो लेना, कौरव बन कर दूसरों की चीज हथियाने के लिए न लड़ना (कौरवों ने पाण्डवों के हिस्से की सम्पत्ति हथियाने की कोशिश की थी)।

जो अपना अधिकार दूसरों को देता है, वह पूजा जाता है। जो कर्तव्य भूल कर अधिकार पाने की कोशिश करता है, उसे कोई नहीं पूछता। राम-भरत आज भी पूजे जाते हैं, कौरवों को कोई नहीं पूछता।

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