वह साथी - हिंदी कहानी
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वह साथी – हिंदी कहानी

वह साथीहिंदी कहानी

रमेश रेलवे स्टेशन पर पालिश किया करता था। उसकी उम्र तो खेलने-कूदने की थी, लेकिन गरीबी ने उसे पालिश-वाला बना दिया था। (वह साथी)

पालिश करने वाले लड़के अक्सर चलती रेलगाड़ियों पर चढ़ते-उतरते हैं। एक दिन चलती रेलगाड़ी से उतरते समय उसका पैर। फिसल गया। उसका एक पैर बुरी तरह से घायल हो गया। अस्पताल में। उसके पैर में टाँके लगाये गये।

अस्पताल में लेटा-लेटा रमेश देखा करता। था कि एक लड़का सुबह-शाम आ कर उसके सिरहाने बैठता है और कभी-कभी कुछ खाने को भी ले आता है। रमेश ने याद करने की कोशिश की—हाँ, यह भी रेलवे स्टेशन पर पालिश करता है।

जिस दिन डाक्टर ने रमेश को अस्पताल से घर जाने की अनुमति दी, उसी दिन वह स्टेशन की ओर चल पड़ा-गिरता-पड़ता, पालिश के धन्धे में जुट जाने के लिए।

स्टेशन पर पहुँच कर वह एक यात्री के जूतों पर पालिश करने लगा, लेकिन उसके हाथ चल ही नहीं रहे थे। उसका शरीर बेहद कमज़ोर हो गया था। वह लड़का, जो अस्पताल में उसके पास आया करता था, दूर खड़ा-खड़ा उसे पालिश करते देख रहा था।

उसने आगे बढ़ कर जूते अपने हाथ में ले लिये और उन पर पालिश करने लगा। यात्री ने पैसे उसी लड़के को दिये। उसने पैसे रमेश की जेब में डाल दिये। फिर बोला- “तुझे आज ही अस्पताल से छट्टी मिली और आज ही धन्धे में जुट गया। तेरे न हाथ चलते हैं, न पैर। कुछ दिन आराम तो कर लेता घर पर।”

“आराम!” कह कर रमेश रोआसा हो गया। फिर कहने लगा- “घर में खाने को कुछ भी नहीं है। माँ और बहने भूखी बैठी होंगी। अब जब पैसे ले कर घर जाऊँगा, तब खाना बनेगा।”

उसका साथी उसे देखता रह गया; बोला कुछ नहीं।

शाम हुई तो रमेश को एक कोने में ले जा कर उसका साथी बोला- “देख, आज मैंने पाँच रुपये कमाये हैं। इन पैसों में से आधे तू ले ले। जब तक तेरी हालत बिलकुल ठीक नहीं हो जाती, तब तक मैं तुझे इसी तरह कुछ-न-कुछ देता रहूँगा।”

“नहीं, मैं न लूँगा।” रमेश बोला-“मुफ्त के पैसों से मेरी माँ को बहुत चिढ़ है। तू वे पैसे भी मुझसे ले ले, जो तूने मेरी जेब में डाल दिये थे।”

“मुफ्त के पैसे क्यों कहता है रे? मैंने कमाया या तूने कमाया, इसमें तू फरक क्यों मानता है?”-यह कह कर उसने रमेश के हाथ पर ढाई रुपये रख दिये।

रमेश को कुछ कहते नहीं बना।

शाम को रमेश के कन्धे पर हाथ रख कर, सहारा देते हुए उसका साथी उसे उसके घर तक पहुँचाने गया। उसने रमेश की माँ के पैर छुए, छोटी-छोटी बहनों के गाल थपथपाये।

माँ ने उसे चिपटा लिया। फिर आसमान की ओर सर तुहाकर हाथ जोड कर कहने लगी-“भगवान्! इसको धन देखा देना: मेरे पास तो देने को कुछ भी नहीं है।”

फिर वह रमेश से कहने लगी-“बेटा, तुझे कितना अच्छा साथी मिला है! तू सचमुच बड़ा भाग्यवान् है। इस तरह से भाग्यवान होना भी एक सुख है। इस सुख के सामने तुझे अपनी गरीबी का दुःख भूल जाना चाहिए.

“नहीं नहीं माँ! मेरी इतनी तारीफ मत करो।” यह का रमेश का वह साथी माँ की बाँह छुड़ा कर भाग गया, और वह सब उस साथी को देखते रह गए.

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