सेवा हो तो ऐसी - हिंदी कहानी
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सेवा हो तो ऐसी – हिंदी कहानी

सेवा हो तो ऐसीहिंदी कहानी

पुरानी घटना है, उन दिनों की, जब प्लेग नाम की एक महामारी फैला करती थी। प्लेग रोग में गिलटियाँ निकल आती थीं। अगर इलाज न हुआ, तो गिलटियाँ रोगी की जान ले लेती थीं। (सेवा हो तो ऐसी)

एक बार मुलतान में प्लेग फैल गया। एक थे पण्डित जी। वह दौड़-दौड़ कर रोगियों की सेवा कर रहे थे। वह डॉक्टर तो नहीं थे, लेकिन प्लेग के रोगियों का थोड़ा-बहुत इलाज कर लेते थे।

एक रात उन्हें खबर मिली कि एक लाला जी प्लेग से बीमार पड़े हैं। पण्डित जी । दौड़े-दौड़े उनके घर गये। लाला जी ने हाथ जोड़ कर रोते हए उनसे कहा- “पण्डित जी, मुझे बचाओ।”

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पण्डित जी ने देखा-लाला जी की एक गिलटी बिलकुल पक, गयी है। अगर गिलटी का आपरेशन तुरन्त नहीं किया गया, तो वह बच नहीं पायेगा.

आधी रात का समय था। आसपास कोई डॉक्टर नहीं मिल सकता था। थोड़ी देर तक वह कुछ सोचते रहे। फिर एक दृढ निश्चय कर लिया—चाहे कुछ भी हो, प्राणों से हाथ धोना पड़े; लेकिन लाला जी को बचाना ही है।

पण्डित जी ने पकी हई गिलटी को स्पिरिट से साफ किया। फिर कुछ करने को आगे बढ़े। एक बार हिचके, लेकिन फिर आगे बढ़े। गिलटी के पास तक अपना मुँह लाये। एक बार फिर मन डॉवाडोल हुआ। लेकिन हिम्मत की उन्होंने-अपने दाँतों से गिलटी को काट लिया।

लाला जी बच गये। पण्डित जी का क्या हुआ, यह पता नहीं; लेकिन उनकी सेवा ने लाला जी को बचा लिया। दूसरे की जीवन-रक्षा करने के लिए अपने प्राणों की चिन्ता किये बिना जो ऐसा खतरनाक काम करने को तैयार हो जाये, उसके द्वारा का गयी सेवा ही सची सेवा होती है; वह सचमुच बहुत ऊँचा इनसान है।

बच्चो, तुम्हारे ऊपर चाहे जैसी मुसीबत आये या प्राणों का संकट पैदा हो जाये, बनना है तुम्हें पण्डित जी की ही तरह। उनकी तरह सेवा करोगे, तभी तुम अपने को इनसान कह सकोगे।

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