सत्य ही उनका रक्षक बना  - Bacche ki Kahani
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सत्य ही उनका रक्षक बना – Bacche ki Kahani

सत्य ही उनका रक्षक बना – Bacche ki Kahani

अब्दुल कादिर जीलानी बड़े पीर साहब को कौन मुसलमान भाई नहीं जानता! यह उनके बचपन की घटना है। (Bacche ki Kahani)

वह बगदाद जा रहे थे पढ़ाई करने के लिए। आयु होगी लगभग दश-बारह वर्ष। अपनी माँ से हठ करके पढ़ने की धुन में अकेले ही चल पडे थे। बगदाद शहर बहुत दूर था। उन दिनों काफिला बना कर पैदल ही चलना पड़ता था।

चलते समय उनकी माँ ने चालीस दीनार उनकी मिरजई में सिल कर रख दिये और कहा- “अल्लाह का नाम ले कर जा। और देख, हमेशा सच बोलना। यह सच (सत्य) ही तेरी हिफ़ाज़त (रक्षा) करेगा।”

हमेशा सच बोलना’-माँ की यह बात उन्होंने गाँठ बाँध ली और चल पड़े। वह काफिले के साथ आगे बढ़ने लगे। रास्ते में डाकुओं ने काफिले पर हमला कर दिया। एक डाकू ने उनसे पूछा- “क्या है तेरे पास?”

उन्होंने भोलेपन से उत्तर दिया- “मेरे पास चालीस दीनारें हैं।”

यह कह कर उन्होंने अपनी मिरजई का वह हिस्सा दिखाया जहाँ उनकी माँ ने दीनार रख दिये थे।

डाकू आश्चर्य में पड़ गया। लोग धन-दौलत छिपाते हैं और वह उसके विषय में बतला रहे थे।

पूछने पर उन्होंने बतलाया- “मेरी माँ ने हमेशा सच बोलने के लिए कहा था। मैंने इसीलिए सच-सच बतला दिया।” उनके ‘सच’ ने उनकी रक्षा की। डाकुओं का सरदार उनके सच बोलने से बहुत प्रसन्न हुआ। उसने उन्हें अपने घोड़े पर बिठला कर बगदाद पहुँचा दिया।

Sukrat ki Kahani

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