पांच करोड़ की शर्त, Bet of 5 Crore Rupees
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पांच करोड़ की शर्त और इतनी छोटी सी बात पर | Bet of 5 Crore Rupees

पांच करोड़ की शर्त और इतनी छोटी सी बात पर | Bet of 5 Crore Rupees

Bet of 5 Crore Rupees – अब ज्ञान चंद (Gyan Chand) को बहुत अफ़सोस हो रहा है कि उसने यह बेवकूफी की ही क्यों ?

हुआ यह कि धनी राम (Dhani Ram) मॉल से बाहर निकल रहे थे तो उनकी टक्कर अंदर आ रहे ज्ञान चंद (Gyan Chand) से हो गई। नतीजा यह हुआ कि धनी राम (Dhani Ram) की बही गिर गई। पढ़े-लिखे ज्ञान चंद (Gyan Chand) ने सॉरी बोल कर निकलना चाहा लेकिन धनी राम (Dhani Ram) ने कॉलर पकड़ लिया और गुर्राया ” सॉरी के बच्चे , मेरी किताब तेरा बाप उठा कर देगा ?”

ज्ञान चंद (Gyan Chand) ने खूब इधर-उधर देखा , उसे कोई किताब नज़र नहीं आई। जब उसने लाल बही को देखा तो हंस कर कहा ” तुम इसे किताब कहते हो ? किताब तो यह होती है , यह ” कह कर उसने गर्व से अपनी पांच किलो की डिक्शनरी दिखाई।

धनी राम (Dhani Ram) ने कहा ” अपनी नकली किताब अपने पास रखो। और सुनो, अपने होश ठिकाने करो। मेरी बही विश्व की सर्वोत्तम किताब है। “

एक योग्य वर की तलाश

ज्ञान होते हुए भी ज्ञान चंद (Gyan Chand) भी अकड़ गया और बस इसी बात पर शर्त लग गई कि बही बड़ी या पुस्तक ?

दोनों ने अपनी अपनी पुस्तकें मॉल के दरवाजे पर ही छोड़ दी और दूर खड़े हो कर देखने लगे।

जो भी आता पुस्तक को ठोकर मार जाता लेकिन बही को उठा कर पास पड़े स्टूल पर रख जाता। सैंकड़ों बार यही हुआ।

धनी राम (Dhani Ram) ने कहा ” अभी भी मान जा बेटा कि बही ही विश्व की सर्वोत्तम पुस्तक है। “

ज्ञान चंद (Gyan Chand) अड़ा रहा तो दोनों फैसला करवाने बाहर निकले। जिस भी दूकानदार ने देखा , बही को प्रणाम किया।

कई किसान तो बही को देख कर थर-थर कांपने लगे। बड़े -बड़े अफसरों , ठेकेदारों और उद्योगपतियों ने बही को तुरंत पहचान लिया।

धनी राम (Dhani Ram) ने पूछा ” अब आई अक्ल ?”

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ज्ञान चंद (Gyan Chand) बोला ” अभी तक पैसे वाले अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे मिले। बस एक जगह और है। उन्होंने भी बही को बड़ा माना तो मैं हार मान लूंगा। “

धनी राम (Dhani Ram) हंस कर बोला ” किसी यूनिवर्सिटी चलना है ? चलो बेटा , वहां भी अपना वहम निकाल लो। “

बड़े से हॉल में मास्टरों-प्रोफेसरों का सेमिनार चल रहा था , ज्ञान चंद (Gyan Chand) अपनी बिरादरी देख कर बहुत खुश हुआ। लेकिन उसे तब बड़ा धक्का लगा जब सभी ने भाग-भाग कर धनी राम (Dhani Ram) के पांव छुए और ज्ञान चंद (Gyan Chand) को पहचाना तक नहीं। (Bet of 5 Crore Rupees)

ज्ञान चंद (Gyan Chand) ने धमकाने की कोशिश की ” नालायको, जिस किताब को पढ़ कर यहां तक पहुंचे , उसी का निरादर ? शर्म करो, शर्म। “

एक प्रोफेसर ने उनके कंधे पर हाथ रख कर दिलासा दी और बोला ” आपकी यह किताब किसी जमाने में बहुत बढ़िया रही होगी, लेकिन अब नहीं । सब की नहीं मैं तो अपनी बताता हूं कि इस बही में मेरे पिता जी ने अंगूठा लगाया , तब मैं पढ़ पाया। मेरे उस साथी ने इसी बही से कर्ज़ा ले कर डिग्री खरीदी और इसी बही की कृपा से नौकरी पाई। क्या समझे ?”

अब ज्ञान चंद (Gyan Chand) को होश आया कि वह शर्त हार गया और ईमानदारी की कमाई से तो उसकी सात पीढ़ियां भी धनी राम (Dhani Ram) को शर्त के पांच करोड़ नहीं चुका पाएंगी। उसने गिड़गिड़ाते हुए धनी राम (Dhani Ram) से पूछा ” कुछ हो सकता है कि आप यह शर्त के पैसे माफ़ कर दें ?”

धनी राम (Dhani Ram) ने कहा ” मुझे तो तेरी औकात पहले ही पता थी , तू ही अकड़ में भूल गया था। तुम्हें सबक सिखाना बहुत जरूरी था। तुम अब रो रहे हो तो एक शर्त पर माफ़ कर सकता हूं “

ज्ञान चंद (Gyan Chand) की जान में जान आई , उसने हुलस कर कहा ” सब शर्तें मानने को तैयार हूं। “

धनी राम (Dhani Ram) ने बही खोली और ज्ञान चंद (Gyan Chand) से इसमें लिखवाया ” मैं ज्ञान चंद (Gyan Chand) पूरे होशो-हवास में अपनी यह डिक्शनरी बहुत ही सम्मानित और परम पूज्य धनी राम (Dhani Ram) जी के चरणों में सादर गिरवी रखता हूं। जब पांच करोड़ रुपए होंगे , इसे छुड़वा लूंगा। विश्व की सर्वोत्तम पुस्तक बही ही है। “

यह लिख कर ज्ञान चंद (Gyan Chand) हस्ताक्षर करने लगा तो धनी राम (Dhani Ram) ने पैन छीन लिया और कहा ” अंगूठा लगाओ बेटा, अंगूठा। ” (Bet of 5 Crore Rupees)

ज्ञान चंद (Gyan Chand) कहने वाला था ” मेरा नाम ज्ञान चंद (Gyan Chand) है , एम ए , पीएच डी ” लेकिन उसने अपने ज्ञान और किताब का मूल्य देख लिया था इसलिए सर झुका कर अंगूठा लगा दिया।

धनी राम (Dhani Ram) ने जाते-जाते कहा ” नाम तो तुम्हारा ज्ञान चंद (Gyan Chand) है लेकिन थोड़ा ज्ञान मुझसे भी ले ही जाओ। “आज के युग में धन से विद्या मिल सकती है , विद्या से धन नहीं। और सुनो , गुरु (Guru) वह नहीं होता जिसके पास ज्ञान हो , बल्कि असली गुरु (Guru) वह वह होता है जिसके पास न हो तो भी ज्ञान दे दे । तो आज से मैं तुम्हारा गुरु (Guru)। चलो पांव छू कर गुरु (Guru)-दक्षिणा दो। “

फिर ज्ञान चंद (Gyan Chand) धनी राम (Dhani Ram) के पांवों में इतना झुका कि अब उससे सीधा भी नहीं हुआ जा रहा। उस दिन के बाद से आज तक किसी भी ज्ञान चंद (Gyan Chand) की कमर सीधी नहीं हो पाई।

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