और भगवान डर गये – Bhagwan aur Bhakt ki Kahani - Indian Story
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और भगवान डर गये – Bhagwan aur Bhakt ki Kahani

और भगवान डर गये – Bhagwan aur Bhakt ki Kahani

सन्त नामदेव की बाल्यावस्था की घटना है। उनके पिता एक मन्दिर के पजारी थे। एक दिन उनके पिता को किसी कार्यवश बाहर जाना पड़ा। इसलिए उन्होंने नामदेव को मन्दिर में पूजा करने का भार सौंप दिया। (Bhagwan aur Bhakt ki Kahani)

नामदेव पूजा करने बैठे। भगवान की मूर्ति के आगे दूध से भरी कटोरी रख कर वह बोले-“लो, दूध पियो।”

ऐसा कह कर वह मूर्ति की ओर एकटक देखने लगे—सोचने लगे, अब मूर्ति दूध उठा कर पी लेगी। परन्तु जहाँ मूर्ति थी, वहीं वह रही; और जहाँ कटोरी थी, वहीं कटोरी रखी रही। – नामदेव ने मूर्ति से कहा- “आप पिताजी का लगाया हुआ भोग ग्रहण कर लेते हैं। मैं दे रहा हूँ, तो क्यों नहीं ग्रहण करते?”

लेकिन, कौन उत्तर दे?

नामदेव उत्तर की प्रतीक्षा में मर्ति को निहार रहे थे। जब कोई उत्तर न मिला तो वह रोआसे हो गये। उन्होंने फिर अपनी बात दोहरायी दरा बार स्नेह-भरे क्रोध से भर कर। फिर भी मूर्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया। अब रोने लगे नामदेव। रोते-रोते बोले-“यह दूध आपको पीना ही पड़ेगा। यह ज़िद है मेरी।”

लेकिन, कौन पिये दूध?

नामदेव के पास में ही एक चाकू पड़ा था। उन्होंने उसे उठा लिया और बोले-“आप दूध नहीं पियेंगे, तो मैं अपना गला काट लँगा।’

यह कह कर उन्होंने अपने गले पर चाकू रखा।

और भगवान् सोचने लगे, सोचने लगे-मेरे कारण मेरा प्यारा भक्त कहीं अपनी हत्या न कर ले! प्रकट हो गये मूर्ति से और दूध पीने लगे।

यह सच्ची घटना है। बच्चो, सोचो जरा, क्यों प्रकट हो गये भगवान्? इसलिए कि नामदेव के हृदय में भगवान के प्रति सच्चा विश्वास था। उन्होंने मूर्ति को मूर्ति समझ कर नहीं, भगवान समझ कर दूध का भोग लगाया था। उनके विश्वास की रक्षा की भगवान ने।

तुम भी सन्त नामदेव की तरह बन सकते हो। उनकी तरह सच्चे विश्वास के साथ भगवान को पुकारोगे, तो भगवान प्रकट हो जायेंगे तुम्हारे सामने भी।

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