मुझे चालीस करोड़ लोगों की चिन्ता है – Bharat ki Azadi ki Kahani
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मुझे चालीस करोड़ लोगों की चिन्ता है – Bharat ki Azadi ki Kahani

मुझे चालीस करोड़ लोगों की चिन्ता है – Bharat ki Azadi ki Kahani

अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर एक सज्जन प्रथम श्रेणी के डिब्बे से उतरे और उन्होंने कुली को आवाज दी। सीधे-सादे एक नौजवान ने आ कर उनका बक्सा अपने सर पर उठा लिया। स्टेशन से बाहर बग्घी में सामान रख कर वह नौजवान मजदूरी लेने के लिए खड़ा हो गया। (Bharat ki Azadi ki Kahani)

उन सज्जन ने एक चवन्नी उसके हाथ पर रखी। चवन्नी ले कर वह चलने लगा, तो उन्होंने फिर पूछा- “कम तो नहीं है मजदूरी? एक समय का भोजन कितने में मिल जाता है?”

उस नौजवान ने कहा- “आप मेरे भोजन के बारे में पूछ रहे हैं?” “हाँ, तुम्हारे ही?’

“लेकिन, मैं अकेला कहाँ हूँ? मुझे तो चालीस करोड़ लोगों की चिन्ता है।”

“चालीस करोड़!’–उन सज्जन ने आश्चर्य से कहा। उनकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया उस नौजवान ने; और चल दिया।

वह सज्जन उसे देखते रह गये।

उसी दिन शाम को वह सज्जन एक सभा में भाषण सुनने गये। उन्होंने देखा कि वही नौजवान भाषण दे रहा था। वह कह रहा था- “मुझे अपने उन चालीस करोड़ देशवासियों की चिन्ता है जिन्हें अंगरेजों ने गुलाम बना रखा है, जो गरीबी और कर्जे के दो पाटों में पिस रहे हैं।

Bharat ki Azadi ki Kahani in Hindi

मैं यह झोली फैला रहा है। रेलवे स्टेशन पर मजदूरी करके मैंने जो धन इकट्ठा किया है, उसे मैंने इस झोली में डाल दिया है। आप भी अपने देश के गरीब भाइयों के लिए दीजिए, दिल खोल कर दीजिए।”

देखते-देखते वह झोली नोटों से भर गयी।

खिसियाये से वह सज्जन उस नौजवान के पास आये और उसके पैरों पर अपना शिर रख कर बोले- “मैं अपनी सारी सम्पत्ति आपको अर्पित करता हूँ।” (Bharat ki Azadi ki Kahani)

यह उन दिनों की घटना है जब भारत देश स्वतन्त्र नहीं हुआ था। वह नौजवान गुजरात का एक समाज-सेवक था।

अब हम अपनी तुलना उस समाज-सेवक से करें। हम लोग वही करते हैं, जिससे या जितने से अपना या अपने परिवार वालों का भला होता है। नौकरी करेंगे तो अपनों के लिए, मकान बनायेंगे तो अपनों के लिए, कपड़ा खरीदेंगे तो अपनों के लिए।

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अब, जो तुम्हारे परिवार के नहीं हैं, जो तुमसे परिचित नहीं हैं; परन्तु जो गरीब, अधनंगे और भूखे हैं—उनकी चिन्ता कौन करेगा? तुम्हीं को करनी है उनकी चिन्ता। अपने सोचने के ढंग को बदलो। तुम कुछ भी करो, तो सोचो—इससे दूसरों का कितना भला होगा, इससे गरीबों के कितने दुःख दूर हो सकेंगे। इसी तरह सोचा था गुजरात के उस समाज-सेवक ने।

तुम भी सोचोगे न उसकी तरह? तुम्हारे जीवन की सफलता अपने ही सुख की ओर देखने में नहीं है, दूसरों के दुःख की ओर देखने में भी है-नहीं, इसे यों कहो-केवल दूसरों के दुःख की ओर देखने में है। (Bharat ki Azadi ki Kahani)

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