बुरा जो देखन मैं चला – Burai aur Acchai ki Kahani
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बुरा जो देखन मैं चला – Burai aur Acchai ki Kahani

बुरा जो देखन मैं चला – Burai aur Acchai ki Kahani

एक दिन एक गुरु के पास आदमियों की भीड़ एक औरत को घसीटते हुए लायी। भीड़ का प्रत्येक आदमी चिल्ला रहा था— “इस आरत ने घोर अपराध किया है। ऐसी स्त्री को पत्थरों से मार-मार कर इसके प्राण ले लेने चाहिए। बतलाइए, इसके विषय में आप क्या कहते हैं?’ (Burai aur Acchai ki Kahani)

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गुरु बोले- “आप लोग पत्थर मार-मार कर अवश्य इसके प्राण ले लें, परन्तु पहले मेरी एक बात सुन लें—पहला पत्थर वही मारगा, जो कहेगा कि मुझमें एक भी दोष नहीं है।’

अब तो दृश्य ही बदल गया। धीरे-धीरे लोग वहाँ से हटने लगे। थोड़ी देर बाद केवल दो लोग ही वहाँ रह गये- गुरु और वह औरत।

यह क्या बात हुई! गुस्से से भरी हुई भीड़ वापस क्यों चली गयी? इसका एक कारण है। हम ईमानदारी से अपना निरीक्षण करने बैठे तो हम पायेंगे कि हममें दोष-ही-दोष हैं। प्रभु ईसा के कहने पर लोगों ने

अपने-अपने विषय में सोचा होगा और अपने में कुछ-न-कुछ दोष अवश्य पाया होगा।

दूसरों के दोषों को देखने से पहले हमें अपने दोषों की ओर देखना चाहिए। सुना ही होगा तुमने— ‘बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा न कोय।’

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