कब्ज़ रोग क्या है – What is Constipation
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कब्ज़ रोग क्या है? – What is Constipation?

कब्ज़ रोग क्या है? – What is Constipation?

कब्ज़ का अर्थ है (constipation) समय पर पेट से गंदगी को न निकलाना जिससे कि पेट में गंदगी जमा होती रहती है। जो अतंड़ियों के साथ चिपक जाती है। इस गंदगी के कारण हमारी अंतड़ियां काम करना बंद कर देती हैं अथवा अपना काम पूरा नहीं कर पाती।

एसा होने से हमारी पाचण शक्ति कम होना शरू हो जाती है आर धीरे-धीरे ऐसा समय आता है कि हम अपना स्वास्थ्य खराब कर लेत है। जिस प्राणी की पाचण शक्ति ही बेकार हो जाती है उसके शरार खुन बनना बंद हो जाता है।

आप स्वयं ही सोचो जब शरीर में खून न रहेगा अथवा खून की मात्रा कम हो जाए तो हमारा हाल वही होगा। किसी गाड़ी के अंदर पट्रौल समाप्त होने पर उस गाडी का हाताह इसलिये आप सब इस रोग को एक गंभीर रोग समझो।

कब्ज़ रोग – Constipation Disease

यदि कब्ज रोग (constipation) की सब बीमारियों की जड़ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। ऐसे रोग कोभी का लोग नजरअंदाज कर जाते है। कब्त होने पर कोई चिता भी नहीं होती। बस यही समझ लेते। कोई बात नहीं यह तो चलता रहता है। आज नहीं तो कल अपने आप ही ठीक हो जाएगा।

इसके साथ साथ का रोग ऐसे भी है, जो कब्ज (constipation) होने पर डाका के पास भागे जाते है और डाक्टर लोग उनके रोग को बका चकाका इस प्रकार बताते है कि रोगी डर सा जाता है। इसे कहते हैं रोग का वहम अधिक।

ऐसे मौके पर मुझे विश्व के प्रसिद्ध हकीम लुकमान साहब की याद आती है। यूनान के इस महान हकीम ने रोगों को इतना भयंका नहीं माना था जितना कि वहम को भयंकर माना था तभी से लोगों ने यह कहावत शुरू की थी।

“वहम का इलाज तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं था।

इससे आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि वहम कितनी बरी चीज है यह कहना तो मझे अच्छा नहीं लगता कि कुछ डाक्टर धन बटोरने के लिये ही लोगों के मनों में वहम पैदा करते रहते हैं। उन्हें इस बात का अहसास करवा देते हैं कि तुम रोगी हो।

ऐसे अवसर वहम के विषय को लेकर शेख चिल्ली के साथ एक दुर्घटना याद आ रही है।

शेख चिल्ली साहब बडे सीधे और भले आदमी थे। हर एक की बात का विश्वास कर लेते थे। उनके मन में कोई पाप तो था नहीं। सबके भले की बात सोचते थे।

एक बार किसी फकीर, साधु ने शेख चिल्ली से मज़ाक में यह कह दिया –

अरे मियां इतना अधिक काम मत किया करो, इन्सानी जिंदगी का क्या भरोसा दो दिन, पांच दिन, दस दिन इससे अधिक जीवन ही क्या है?

शेख चिल्ली बेचारा साधू के मुख से यह सब सुनकर सोचने लगा कि साधु जी तो ठीक ही कहते होंगे क्योंकि उसने सुन रखा था कि साधू लोग भगवान का रूप होते हैं। भगवान की शक्ति इन साधुओं में आ जाती है।

इस साधू ने तो उससे कहा है कि इन्सान का जीवन ही क्या है ? पांच दिन, दस दिन….. पांच दिन, दस दिन…. पांच दिन, दस दिन.,..

इसका अर्थ तो यह हुआ कि अब उसकी जिंदगी तो केवल पांच दस दिन की ही रह गयी है।

पांच और दस = पन्द्रह

उसकी जिंदगी के कुल पंद्रह दिन ही बाकी रह गए हैं। दिन की जिंदगी बची है। अब क्या है ?

“पंद्रह दिन”

जब पन्द्रह दिन के पश्चात् ही मर जाना है, तो फिर इस संसार में रह कर क्या करना है? __पंद्रह दिन के पश्चात लोग मुझे मरने के पश्चात उठाकर ले जाएंगे। बेकार में इन लोगों को कष्ट देने का क्या लाभ है। मैं क्यों न स्वयं ही जाकर अपनी कब्र खोदकर उसमें लेट जाऊं। पंद्रह दिन के पश्चात् वही पर मर जाऊंगा….बस सारी कहानी समाप्त हो जाएगी।

यही सोचकर शेख चिल्ली ने अपनी कब्र को खोदना शुरु कर दिया। बड़े मज़े से अपनी कब्र खोदी उसमें पंद्रह दिन का खान पान भी रख लिया उसी कब्र में चारपाई बिछा कर बिस्तर लगाकर बड़े मज़े से लेट गए।

पंद्रह दिन तक उसी कब्र में अपनी चारपाई बिछाए लेटे हुए शेख चिल्ली के घर वाले बड़े चिंतित थे कि आखिर शेख साहब गए तो कहां गए? सब लोग उनकी तलाश में इधर उधर भटक रहे थे। न जाने कहां कहां उनकी तलाश होती रही। लेकिन शेख साहब कहीं होते तो मिलते। किसी को क्या खबर थी कि शेख साहब वहम का शिकार हो कर पहले से ही मर चुके हैं।

पंद्रह दिन के पश्चात्

जब गांव के किसी आदमी की मृत्यु हुई तो लोग उसका अंतिम संस्कार करने के लिये शमशान भूमि पहुंचे तो वहां पर अचानक ही उनकी नज़र शेख साहब पर पड़ी तो लोग उसके पास पहुंचे।

अरे शेख साहब आप?….हम तो आप को ढूंढते ढूंढते पागल हो गए…और आप….

हां…हां….मैं अपनी कब्र में लेटा हु ऐसा क्यों है शेख साहब।

मुझे साधू जी ने कहा था कि तम पंद्रह दिन के अंदर मर जाओगे। यह जीवन तो पांच दस का ही होता है। फिर क्या मैंने सोचा जब पाच दस अर्थात पंद्रह दिन के पश्चात ही मरना है तो पंद्रह दिन के पश्चात किसी पर बोझ बनने का क्या लाभ? क्यों न अपनी कब्र आपखादकर आराम से लेट जाएं। बस अब मैं मर चुका हूं आप लोग जाजा गु शांति से मरने दो।

तब लोग बोले

भैया तुम मरे कहां हो तुम तो अच्छे खासे बोल रहे हो। हम स बाते कर रहे हो।

हां…हां…मैं ताजा ताजा मरा हुआ हूं। इसलिये बोल रहा हूं। साध जी ने जो कह दिया वह झठ नहीं हो सकता। तुम लोग में अब मर चुका

इसे कहते हैं वहम

इस वहम का इलाज तो लुकमान साहब भी नहीं कर सके। में भला कैसे कर सकता हूं। मैं तो आप को यह बताना चाहता हूं कि रोग के वहम में न पडे ।

उपचार तो हर रोग होना जरुरी है परन्त वहम का इलाज कोई नहीं कर सकता। लोभी लालच डाक्टर पहले यही वहम पैदा करते हैं और अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं।

रोग कोई भी हो उसका उपचार प्रथम चरण में ही कर लें तो अधिक अच्छा है जैसे छोटे पौधे को जिधर मनचाहे मोड लो, तोड़ लो। परन्तु जैसे ही यह पौधा बड़ा हो जाता है फिर उसे आप अपनी इच्छा से नहीं मोड़ सकते।

ठीक इसी प्रकार से पुराने रोग का उपचार भी कठिन हो जाता है। कई बार तो समय इतना आगे निकल जाता है कि हम भागकर भी उसे पकड़ नहीं सकते। इसका परिणाम अच्छा नहीं निकलता। जो काम साधारण रूप से हो सकता था उसे गंभीरता से भी हम दूर नहीं कर पाते।

जैसे कब्ज रोग है, इसका उपचार प्रथम चरण में तो कोई कठिन नहीं लेकिन जैसे ही इस रोग के पांव जम जाते हैं तो यह और अनेक रोगों को जन्म दे देता है। ऐसा लगता है कि मानव शरीर के विरुद्ध यह अपनी पूरी सेना तैयार कर लेता है।

इसलिये आप (कब्ज रोगियों) (constipation) को सबसे पहले प्रथम चरण में ही इस रोग को रोकने का प्रयास करें।

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