विरोधों का सामना कैसे करें – Guru aur Shishya ki Kahani
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विरोधों का सामना कैसे करें – Guru aur Shishya ki Kahani

विरोधों का सामना कैसे करें – Guru aur Shishya ki Kahani

गुरु जी अपने अनुयायी प्रेम के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में प्रेम को उसका एक शत्रु मिला। वह प्रेम से लड़ने लगा। प्रेम ने पहले तो प्रेम से बातें करके शत्रु का क्रोध शान्त करना चाहा; लेकिन शत्रु को तो मार-पीट के अलावा कुछ सझ ही नहीं रहा था। वह लगातार प्रेम से लड़ता ही जा रहा था। जब प्रेम का धैर्य छुट गया तो क्रोध में आ कर वह भी घूसे का जवाब घुसे से देने लगा। (Guru aur Shishya)

और तभी एक घटना घटी। गुरु जी जो पास में खड़े यह सब देख रहे थे, वहाँ से हट गये।

जब लड़ाई समाप्त हुई, तब प्रेम ने गुरु जी से दःखी हो कर पूछा- “मुझे मुसीबत में छोड़ कर आप हट क्यों गए.

पाल ने कहा- ‘मैं यों ही नहीं हट गया था। जब तक तक तुम उस से प्रेम से बातें कर रहा था, भगवन तेरी रक्षा कर रहे थे, लेकिन जब तू लडाई करने लगा, तब भगवन दूत चले गये। जब परमात्मा ने ही तेरा साथ छोड़ दिया, तो मैं तेरे पास रह कर क्या करता?”

गुरु जी की इस बात का अर्थ बहुत गहरा है। भगवान उनकी सहायता नहीं करता जो अपने बाहु-बल का सहारा ले कर परिस्थितियों से निपटना चाहते हैं, अथवा जो क्रोध. अभिमान आदि दर्गणों के बल पर विरोधों का सामना करना चाहते हैं। भगवान उनकी सहायता करता है जो भगवान पर अपने को छोड़ कर अपने सदगणों

प्रेम, करुणा आदि के सहारे इनका सामना करते हैं। विरोधों का सामना करने के लिए पहले अपने को दुर्गुणों से मुक्त करना आवश्यक है।

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