फिर वह दौड़े आयेंगे तुमसे मिलने – Krishan aur Unke Mitr ki Kahani
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फिर वह दौड़े आयेंगे तुमसे मिलने – Krishan aur Unke Mitr ki Kahani

फिर वह दौड़े आयेंगे तुमसे मिलने – Krishan aur Unke Mitr ki Kahani

यह पुरानी घटना है। वृन्दावन में श्रीग्नावत नामक स्थान पर एक बंगाली बाबा रहा करते थे। तेरह-चौदह वर्ष का एक बालक उनका सेवक था। लोग उसे भोंदू कहा करते थे। इसका कारण यह था कि वह बहुत सरल हृदय का बालक था। वह दूसरों की बातें सच मान लिया करता था। सन्देह करना उसने सीखा ही नहीं था। तर्क करने की आदत भी उसमें नहीं थी। (Krishan aur Unke Mitr ki Kahani)

भोंदू बाबा की गायें चराने के लिए यमुना-पार भाण्डीरवन में जाया करता था। किसी ने उससे कह दिया कि कृष्ण कन्हैया भाण्डीरवन में ग्वाल-बाल-सहित गायें चराने आया करते हैं। बस, उसने इस बात पर विश्वास कर लिया। अब वह नित्य ही सोचने लगा—अब तो किसी-न-किसी दिन कन्हैया से अवश्य भेंट होगी। भेट हो जाये, तो मित्रता अवश्य कर लूँगा।

और, सचमुच एक दिन भेंट हो गयी उसकी कन्हैया से। मित्रता होने में देर नहीं लगी।

एक दिन उसने कन्हैया से पूछा- “तुम्हें दाल-बाटी अच्छी लगती है?”

“हाँ, हाँ-बहुत अच्छी लगती है।’–कन्हैया ने मुस्करा कर कहा।

“देखो, वैसे तो मैं दाल-बाटी का प्रसाद पा कर आता हूँ, लेकिन तुम कहो, तो हम दाल-बाटी यहीं बना लिया करें। मैं आटा-दाल ले आया करूँगा।”

“ठीक है, भोंदू।’–कन्हैया ने स्वीकृति दे दी।

और, अब भोंदू रोज सिर पर आटा-दाल की गठरी लाद कर गायें चराने के लिए जाने लगा।

एक दिन बाबा ने उससे पूछा- “यह आटा-दाल किसके लिए ले जाता है रे?”

“बाबा, कन्हैया है न? उसे दाल-बाटी बहुत अच्छी लगती है। उसके साथ के ग्वाल-बालों को भी बहुत अच्छी लगती है। वहीं भाण्डीरवन में हम सब मिल कर दाल-बाटी बना कर खाते हैं।” ।

“कौन कन्हैया?”-बाबा ने आश्चर्य से पूछा।।

“अरे, वही जो वंशी बजाता है। रोज़ ही तो आता है गायें चराने भाण्डीरवन में ग्वाल-बालों के साथ।”

“बताओ तो, कैसा है वह?”

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“बाबा, यह न पूछो। इतना सुन्दर है वह….मैं नहीं बखान कर पाऊँगा उसकी सुन्दरता का। सिर पर मोर-मुकट पहने हुए जब वह वंशी बजाने लगता है तो…..बाबा, मुझसे कहा नहीं जाता।”

“अच्छा! बाबा उसकी ओर आश्चर्य से आँखें फाड़े हुए देखते रहे। उन्हें भोंदू की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था, परन्तु वह यह भी समझते थे कि सरल हृदय का भोंदू झूठ नहीं बोल सकता।

बाबा बोले—’भोंदू, मेरी बात सुन! एक दिन तू कन्हैया और उनके ग्वाल-बालों को यहाँ लिवा कर ला। कहना, बाबा ने निमन्त्रण दिया है। फिर यहीं दाल-बाटी बना कर खिलाना उन सबको। परन्तु एक बात बता–वे यहाँ आ जायेंगे न?”

“हाँ, हाँ, क्यों नहीं आयेंगे। मैं उन्हें लिवा कर लाऊँगा।” भोंदू ने बहुत विश्वास के साथ कहा।

उसी दिन भाण्डीरवन में भोंदू ने कन्हैया से कहा- “बाबा ने तुम सबको निमन्त्रण दिया है दाल-बाटी का। कल चलना मेरे साथ।”

“नहीं, हमें नहीं जाना। हमें क्या मतलब तुम्हारे बाबा से?”

“नहीं, नहीं, कन्हैया! तुम्हें चलना पड़ेगा।” “न भाई, हम किसी के निमन्त्रण में नहीं जाते।” “तो, तुम नहीं चलोगे?” रोआसा हो कर भोंदू ने पूछा। “ना” कन्हैया ने अपनी बात दोहरा दी।

“ठीक है, तुम्हारी इच्छा।’–कह कर भोंदू मुड़ा और अपनी गायों को ले कर एक ओर को जाने लगा।

थोड़ी दूर गया होगा भोंदू कि कन्हैया ने पुकारा—“अरे, सुन तो।”

आँसू बहाता हुआ मुँह फुलाये भोंदू चलता रहा। तब कन्हैया पीछे से आ कर रास्ता रोक कर खड़े हो गये। बोले– “सुन तो।”

“नहीं, मुझे नहीं सुननी किसी की बात।” (Krishan aur Unke Mitr ki Kahani)

कन्हैया बोले- “तू बिलकुल भोला है, बात नहीं समझता। देख, श्रीन्गावट, जहाँ तेरे बाबा रहते हैं, राधारानी का स्थान है। अब वहाँ बलदाऊ साथ में कैसे जायेंगे? ये ग्वाल-बाल कैसे जायेंगे? मैंने तो इसीलिए जाने से मना किया था।’

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फिर कन्हैया ने भोंदू के गले में बाहें डालीं और उसे उस स्थान पर लिवा लाये जहाँ से वह दुःखी हो कर चला आया था। फिर सबने दाल-बाटी बनायी। कन्हैया ने अपने हाथ से भोंदू को दाल-बाटी खिलायी।

बच्चो, यह कहानी तुम्हें अच्छी लगी न? भगवान हैं, अवश्य हैं, तुम जहाँ हो, उसी स्थान पर हैं और इसी क्षण हैं—इस बात को मान लेने के लिए तुम्हें भोंद्र की तरह बनना होगा। इस बात को मान लेने के लिए तुम्हें न सन्देह करना है, न तर्क करना है।

बस, तुम्हें इस बात को सच मान लेना है उसी प्रकार, जिस प्रकार तुम इस बात को सच मानते हो कि तुम हो, घर-परिवार है और संगी-साथी हैं। यदि तुम भगवान के दर्शन करना चाहते हो. (Krishan aur Unke Mitr ki Kahani)

तो भगवान हैं—इस विषय में अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं है। बस, उनके होने के विषय में विश्वास कर लेना है। तुम्हें। तब क्या होगा? वही भगवान्, जिन्हें तुमने अब तक देखा नहीं है, तुम्हारे सामने प्रकट हो जायेंगे, और तुमसे उसी प्रकार बातें करेंगे, जिस प्रकार वह भोंदू से बातें किया करते थे।

परन्तु एक शर्त है—सच्चे मन से विश्वास कर लेने के साथ-साथ तुम्हें यह सोचना होगा—नित्य सोचना होगा, सदैव सोचना होगा कि किसी-न-किसी दिन भगवान से अवश्य भेंट होगी, अवश्य भेंट होगी।

बस, इतना ही तुम्हें करना है—शेष सब भगवान पर छोड़ दो। फिर, ‘वह’ दौड़े आयेंगे तुमसे मिलने।

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