Pushpa Film Review in Hindi
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Pushpa Film Review in Hindi – फ़िल्म पुष्पा की कौनसी बात आपको सबसे अच्छी लगती है?

Pushpa Film Review in Hindi – फ़िल्म पुष्पा की कौनसी बात आपको सबसे अच्छी लगती है?

Pushpa Film Review in Hindi – आपको Taarak Mehta वाली अंजली भाभी तो याद ही होंगी? बेचारे मेहताजी अंजली भाभी के हाथ का सात्विक खाना खा कर भी अपना मुँह कैसे हंसता हुआ रखते होंगे? और ऐसा खाना खाते हुए मेहताजी को कभी जब अनलिमिटेड मसालेदार चटपटे स्ट्रीट फूड का चटाका नसीब हो जाए तो?

वो भी लंबे उपवासों के पश्चात… तो

ये ही ‘पुष्पा’ का जादू हैं।

बॉलीवुड में कुछ ऐसे writers, directors और designers हैं, जिन पर मुझे संदेह है कि वो “गे” हैं। मैं काफी समय से नोटिस कर रहा हूँ कि बॉलीवुड फिल्म के नायक कुछ ज्यादा ही ‘खुबसुरत’ लगते हैं।

सफाचट दाढी मूंछ और हेयर जेल का उपयोग करके बनाई हुई स्टाइलिश केशभूषा। सोचता हूं कि होंठों पर लिपस्टिक लगाना ही क्यों शेष रखा? जबकि makeup तो करते ही है। साथ ही जिम में फुलाई हुई भुजाओं के स्नायु, जो कि प्लास्टिक जैसे ज्यादा लगते हैं, सिक्स पैक एब्स, पतली कमर, वो भी बिल्कुल साफ जैसे कि ताजा ताजा वैक्स किया हो।

मुझे तो इन नायकों को देखकर अकसर समलिंगीयों का ही एहसास होता था। लगता था कि पौरुषत्व की नसबंदी ही कर दी गई हो।

लेकिन ‘पुष्पा’…..!! (Pushpa The Fire)

Pushpa Film Review in Hindi

लापरवाह बढी हुई दाढी, नफिकराई से बिखरे बाल, मैला शर्ट और नीचे कुचली हुई लुंगी, पैरों में सस्ते चप्पल, तेरा मेढा बॉडी पोश्चर, काफी दिनों से स्नान न करने के कारण बदन से उठती खट्टी बास।

देहाती गीतों की ताल पर थिरकते पैर और हल्के परंतु मक्खन में छुरी की तरह दिल में ‘खच्च’ करके उतरने वाले शब्द और हरकतें एवं सभी को महिला होने की गैर समझ हो जाए ऐसे नाम वाला एक ‘मरद’ !

‘पुष्पा’ – ‘Pushpa’

वो ‘मरद’ जिसने अपने दम पर कौवे उडते वीरान थिएटरों को पंख फैलाकर नाचते मयूरों में परिवर्तित कर दिया।

एक पुरुष उसके designers look से आकर्षक नहीं लगता, बल्कि उसका आकर्षण होता है उसकी ‘मर्दानगी’ में!

और वो आती हैं उसकी बेफिक्र और बिंदास चुनौतियों का सामना करने की क्षमता में से।

उसके बंद होंठों की ‘टशन’ और खुली आंख से भभुकती आग से नस नस में हिलोर लेते आत्मविश्वास से। कोन्फिडंस… या डेरिंग!

झुकेगा नहीं साला !

Pushpa Film Review in Hindi

विपरीत हालातों में विचलित होने की बजाय शांति से निरखने की कुल अदा..!

मैदान में जरा सा अन अपेक्षित होते ही चिल्ला लोट करते virat kohli अपने आप को वामन साबित करते हैं, जबकि चुपचाप ठंडे कलेजे से सहन करते हुए मैदान में पूर्ण समर्पण से टिक कर खडे ‘माही’ Mahendra Singh Dhoni को यों ही कैप्टन कूल नहीं कहा जाता है।

पुष्पा’ का एक्शन वास्तविक जिंदगी में होता है ऐसा देहाती और कठोर हैं। वो रोमांस भी तमंचाछाप करता है।

फिल्म की कहानी तो वही पुरानी फिल्मों को तडका देकर बनाई गई है, किंतु मुझे फिल्म का देसी मिजाज बेहद पसंद आया। कहते हैं न कि असली भारत तो देहातों में ही बसता हैं। यह फिल्म हमारे मूल को दर्शाती हैं।

मै स्वीकार करता हूँ कि फिल्म के कलाकार अल्लु अर्जुन, रश्मिका, सामंथा, फहाद फाजिल आदि पुष्पा’ जैसी जिंदगी नहीं जीते। परंतु वो प्रतिनिधित्व उन देहातीयों और मध्यम वर्ग का ही करते हैं, जो अपनी मेहनत का पैसा खर्च करके उन्हें पर्दे पर देखने जाते हैं।

भड़क और चटक रंगों के बिना भारत, भारत नहीं है।

Pushpa Film Review in Hindi

और इस भारत को दर्शाने के कारण ही पुष्पा’ मुझे अच्छी लगी। विडंबना है कि हमारा बॉलीवुड एक विशेष वर्ग के प्रति अपने ऐजेंडा को लेकर इस मूल भारत की उपेक्षा करता है।

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