अपनी मेहनत की कमाई – Raja aur Pandit ki Kahani
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अपनी मेहनत की कमाई – Raja aur Pandit ki Kahani

अपनी मेहनत की कमाई – Raja aur Pandit ki Kahani

एक राजा के दरबार में एक पण्डित जी आये। राजा उनका बहुत सम्मान करते थे। हाथ जोड़ कर बोले- “आपकी क्या सेवा कर करूँ?” (Raja aur Pandit ki Kahani)

पण्डित जी ने कहा- “अपनी मेहनत की कमाई के कुछ पैसे दे सकें, तो ले लूँगा।”

पण्डित जी की बात सुन कर राजा चुप हो गये। कुछ सोच कर बोले- “आप कुछ दिनों बाद पधारें। तब जो-कुछ सेवा बन पड़ेगी, करूँगा।”

रात को लेटे-लेटे राजा ने सोचा-खजाने में सारा धन प्रजा का है। अपनी मेहनत की कमाई कहाँ से लाऊँ? ठीक है, कुछ मेहनत करके पैसा कमाऊँगा।

दूसरे दिन मुँह अँधेरे राजा मजदूरों का वेश बना कर महल से बाहर निकल गये। एक लोहार के यहाँ दिन-भर मजदूरी की। चलते समय लोहार ने मजदूरी के कुछ पैसे उन्हें पकड़ा दिये।

कुछ दिनों बाद पण्डित जी दोबारा आये, तब राजा ने उन्हें वे पैसे दे दिये। कहा- “मेरे पास इतने ही पैसे अपनी कमाई के है। इन्हें स्वीकार कीजिए।”

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पण्डित जी पैसे ले कर घर आये। उनकी पण्डितानी गुस्से से जल-भुन गयीं। उन्होंने सोचा था कि दो-चार बीघे जमीन तो राजा से मिल ही जायेगी। गुस्से में तो थी ही वह–वे पैसे उन्होंने तुलसी जी के थाले में फेंक दिये।

कुछ दिनों बाद थाले में पौधे उगे। उनमें फलियाँ निकलीं। फलियों में मटर की तरह के दाने निकले। लेकिन दानों की चमक बड़ी निराली थी। बड़े सुन्दर थे वे दाने। पण्डितानी ने वे दाने अपनी मालिन को दे दिये।

मालिन उन दानों को राजमहल ले गयी। कुछ दाने उसके आँचल से गिर पड़े। पास ही राजमहल में पले हुए राजहंसों का जोड़ा बैठा था। राजहंसों ने झट उन्हें चुग लिया।

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सबको बहुत आश्चर्य हुआ; क्योंकि राजहंस तो सिर्फ असली मोती ही चुगते थे? तो क्या वे दाने असली मोती थे? पूछताछ शुरू हुई। राजा ने पण्डित जी से भी पूछा। पण्डित जी ने पण्डितानी से पूछा। तब असली बात बतायी पण्डितानी ने कि राजा के दिये हुए पैसे उन्होंने तुलसी जी के थाले में फेंक दिये थे।

पण्डित जी कुछ देर तक सोचते रहे, फिर बोले- “वे राजा की मेहनत की कमाई के पैसे थे। अपनी मेहनत की कमाई इसी तरह फलती-फूलती है।”

बच्चो, दूसरों की मेहनत से जो कमाता है, उसका उस कमाई पर अधिकार नहीं होता। उस कमाई पर उसका अधिकार होता है, जो सचमुच मेहनत करता है। दूसरों की मेहनत से जो कमाई प्राप्त की जाती है, वह बढ़ती नहीं, घटती ही है। केवल अपनी मेहनत की कमाई ही फलती-फूलती है।

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