आज्ञा पालन – Ram aur Vanvaas ki Kahani
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आज्ञा पालन – Ram aur Vanvaas ki Kahani

आज्ञा पालन – Ram aur Vanvaas ki Kahani

भगवान राम का राजतिलक होने वाला था। अयोध्या में खुशियाँ मनायी जा रही थीं। कौशल्या माँ भी आनन्द में डूबी हुई थीं। तभी वज्रपात हो गया। भगवान राम को वन में जाने का आदेश मिला। भगवान राम कौशल्या माँ के पास आये, विदा माँगने के लिए। भगवान राम को देखते ही कौशल्या माँ बोल उठीं- “आओ लाल, मुझे कितनी प्रसन्नता है कि आज तुम्हारा राजतिलक होगा।” (Ram aur Vanvaas ki Kahani)

भगवान राम बोले-“लेकिन माँ, मुझे चौदह वर्षों तक वन में वास करने का आदेश मिला है।”

कौशल्या माँ स्तब्ध रह गयीं। लगा, मानो धरती फट गयी हो। आँखों के आगे अँधेरा छा गया। लेकिन उन्होंने अपने को सँभाल लिया। पूछा- “किसने आदेश दिया है तुम्हें?”

भगवान राम ने उत्तर दिया- “मँझली माँ और पिताजी ने।”

कौशल्या माँ कुछ देर तक सोचती रहीं। फिर बोलीं- “ठीक है, जाओ। मैं किसी तरह चौदह वर्षों तक तुम्हारी प्रतीक्षा कर लूँगी। तुम माता-पिता की आज्ञा मान रहे हो, इसलिए वन भी तुम्हारे लिए सौ अयोध्याओं के बराबर होगा।”

बच्चो! कौशल्या माँ ने भगवान राम को जाने के लिए कह दिया। उन्हें दुःख नहीं था? दुःख तो बहुत था, लेकिन उन्होंने अपने दुःख को छिपा लिया। वह नहीं चाहती थीं कि उनका पुत्र बड़ों की आज्ञा न माने।

वह दुःख सहने को तैयार थीं, लेकिन वह यह कैसे सहन करतीं कि राम, पिता और माँ की बात न मान कर पाप के भागी बनें। बड़ों के आज्ञा-पालन का इतना महत्त्व होता है! आज्ञा न मान कर तुम कुछ पाते नहीं, वरन् खोते ही हो। पाप के ही भागी नहीं बनते तुम, अपने मन का बल भी खोते हो।

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