जब काँटे फूल बन जाते हैं – Sadhu Sant ki Kahani
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जब काँटे फूल बन जाते हैं – Sadhu Sant ki Kahani

जब काँटे फूल बन जाते हैं – Sadhu Sant ki Kahani

मुनि विश्वामित्र बड़े क्रोधी थे। वसिष्ठ मुनि को वह अपना शत्रु मानते थे। कारण तो कोई विशेष नहीं था। बात यह थी कि वसिष्ठ जी ब्रह्मार्जि कह कर पुकारे जाते थे और विश्वामित्र को राजर्षि कहा जाता था। राजर्षि का पद ब्रह्मर्षि के पद से थोड़ा छोटा होता है। (Sadhu Sant ki Kahani)

बस, इसी बात को ले कर विश्वामित्र अप्रसन्न हो गये थे वसिष्ठ जी से। एक दिन वसिष्ठ जी को मारने के लिए हथियार ले कर वह उस पेड़ पर चढ़ गये, जिसके नीचे वसिष्ठ जी बैठा करते थे।

चाँदनी छिटकी हुई थी। वसिष्ठ जी पेड़ के नीचे आ कर बैठ गये। उनके शिष्य भी उनके निकट बैठ गये।

एक शिष्य ने कहा-“कितना सुन्दर दिखलायी पड़ रहा है चन्द्रमा!”

वसिष्ठ जी बोले- “हाँ, बिलकुल विश्वामित्र जी की तरह सुन्दर और स्वच्छ।”

शिष्य बोला-“लेकिन महाराज, यही मुनि तो आपकी निन्दा किया करते हैं।” वसिष्ठ जी ने उत्तर दिया-“करते होंगे। उनके निन्दा करने से हमें क्या लेना-देना? हमें तो उनके गुणों से सरोकार रखना चाहिए। वह महान् पुरुष हैं। खूब तपस्या की है उन्होंने। भगवान् की भक्ति में दिन-रात तल्लीन रहते हैं। जी चाहता है कि उनके चरणों पर शिर रख दूँ और उनका दास बन जाऊँ।”

विश्वामित्र पेड़ पर बैठे-बैठे यह सब सुन रहे थे। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वसिष्ठ जी उनके प्रति इतना आदर-भाव रखते होंगे। वे पेड़ पर से कूद पड़े और उन्होंने वसिष्ठ जी के चरणों पर अपना शिर रख दिया।

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यह क्या बात हुई! कहाँ तो विश्वामित्र हथियार ले कर वसिष्ठ जी को मारने आये थे और कहाँ उनके चरणों में शिर रख दिया! यह प्रभाव है प्रेम का। वसिष्ठ जी ने अपने प्रेम से विश्वामित्र का क्रोध जीत लिया।

बच्चो! जो तुम्हारे लिए कॉटे बोये, उसके लिए तुम फूल ही बोना—यही प्रेम है। इस प्रेम के प्रभाव से तुम्हारे लिए बोये गये काँटे फूल बन जायेंगे.

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