जानिये सम्राट अशोक के बारे में 21 रोचक तथ्य , 21 Facts about Samrat Ashoka
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सम्राट अशोक के बारे में 21 रोचक तथ्य – 21 Facts about Samrat Ashoka

जानिये सम्राट अशोक के बारे में 21 रोचक तथ्य एवं सम्पूरण जीवनकाल – 21 Facts about Samrat Ashoka and Biography

Fact No. 1 : सम्राट अशोक (samrat ashoka) का पूरा नाम  देवानांप्रिय अशोक मौर्य था.

Fact No. 2 : सम्राट अशोक के पिता (father’s name) का नाम बिन्दुसार तथा माता का नाम (mother’s name) धर्मा था.

Fact No. 3 : अशोक का राजकाल (kingdom) ईसा पूर्व 273 से 232 माना जाता है.

Fact No. 4 : सम्राट अशोक को भारतीय इतिहास (Indian history) में बेहतर प्रशासन और बौद्ध धर्म (Buddha religion) के प्रचार के लिए जाना जाता है.

Fact No. 5 : सम्राट अशोक अपने पूरे जीवन काल (whole life) मे एक भी युद्ध में हारे (never lost any war) नहीं.

Fact No. 6 : अशोक महान राजा होने के साथ ही एक (philosopher) दार्शनिक भी थे.

Fact No. 7 : सम्राट अशोक ने अपने जीवन (life) में 20 से अधिक विश्वविद्यालयों (universities) की स्थापना की थी .

Fact No. 8 : सम्राट अशोक के जीवन में बनाया गया अशोक चिह्न (symbol) आज भारत का राष्ट्रीय चिह्न (national symbol) कहलाता है.

Fact No. 9 : बौद्ध धर्म इतिहास (history) में गौतम बुद्ध के बाद अशोक का नाम (name of ashoka) आता है.

Fact No. 10 : सम्राट अशोक का कलिंग युद्ध (kalinga war) में सोच परिवर्तित हो गई और उन्होंने अहिंसा (non violence) को अपना लिया.

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Fact No. 11: सम्राट अशोक की तुलना (comparatively) विश्‍व इतिहास के महान शासको (great rulers) के साथ की जाती है.

Fact No. 12 : महान शासक अशोक ने अपने जीवन में बौद्ध धर्म के विचारो (thoughts of Buddha) को अपनाया और बौद्ध धर्म के प्रचार – प्रसार पूरे विश्व (marketing in world) में किया.

Fact No. 13 : अशोक के शासन काल को स्वर्णिम काल (golden period) के रूप में याद किया जाता है.

Fact No. 14 : अशोक ने अपने सिद्धांतो (theory) को धम्म नाम दिया था.

Fact No. 15 : अशोक ने राज – सिहांसन के लिए अपने कई भाइयो (kill his own brothers) की हत्या की थी.

Fact No. 16 : अशोक के पुत्र (son) महेंद्र और पुत्री (daughter) संघमित्रा ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म (Buddha religion) का प्रचार किया.

Fact No. 17 : सम्राट अशोक की कई शादियाँ (marriages) हुई थी लेकिन महारानी देवी को ही उनकी रानी (queen) कहा जाता है.

Fact No. 18 : मौर्य वंश (maurya vansh) में सबसे ज्यादा 40 साल शासन सम्राट अशोक ने किया था.

Fact No. 19 : अशोक स्तम्भ से लिया गया अशोक चक्र (ashok chakra) आज हमारे देश भारत के राष्ट्रीय ध्वज (national flag) में भी शामिल है.

Fact No. 20 : अशोक पहला ऐसे सम्राट (1st king) थे जिन्होंने कलिंग को युद्ध (War) में हराया था.

Fact No. 21 : अशोक की मृत्यु (death) 232 ई. पू. मानी जाती है.

सम्राट अशोक का शासनकाल Reign of Samrat Ashoka in Hindi

महान सम्राट अशोक (Samrat Ashoka) को एक निडर, परन्तु बहुत ही बेरहम राजा (king) माना जाता है। उन्हें अवन्ती प्रान्त में हुए दंगों को रोकने (stop) के लिए प्रतिनियुक्त किया गया था। उज्जैन में विद्रोह को दबाने के बाद 286 ईसा पूर्व में उनको अवंती प्रांत (avanti prant) के वायसराय नियुक्त किया गया।

पिता बिन्दुसार नें अशोक (ashoka) को उनके उत्तराधिकारी बेटे सुसीम को एक विद्रोह दमन में मदद (help) मिल सके। इसमें अशोक (Samrat Ashoka) सफल भी हुआ और उसे इसी कारण वह तक्सिला (taksh shila) का वाइसराय भी बना।

272 इसा पूर्व में अशोक (Samrat Ashoka) के पिता बिन्दुसार की मृत्यु हुई, उसके पश्चात दो वर्ष तक अशोक (ashok) और उसके सौतेले भाइयों के बिच घमासान युद्ध (War) चला। दो बौद्ध ग्रन्थ; दिपवासना और महावासना के अनुसार, अशोक (Samrat Ashoka) नें सिंहासन पर कब्ज़ा करने के लिए अपने 99 भाइयों को मार गिराया (killed) और मात्र विटअशोक को बक्श दिया।

उसी समय 272 इसा पूर्व में अशोक (Samrat Ashoka) सिंहासन तो चढ़ा, परन्तु उसका राजभिषेक 269 इसा पूर्व में हुआ और वह मौर्य साम्राज्य (maurya destiny) का तीसरा सम्राट बना।

अपने शाशन काल के दौरान वह अपने साम्राज्य को भारत (india) के सभी उपमहाद्वीपों तक बढ़ने के लिए लगातार 8 वर्षों तक युद्ध (war) करते रहे।

कृष्ण गोदावरी (krishan godavari) के घाटी, दक्षिण में मैसूर में भी उसने कब्ज़ा कर लिया परन्तु तमिल नाडू, केरल और श्रीलंका (sri lanka) पर नहीं कर सका।

कलिंग (kalinga) पर खुनी जंग में 100000 सैनिक और लोगों की मृत्यु हुई। इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु (Death) के बाद सम्राट अशोक (Samrat Ashoka) के मन में बदलाव आगया और उसने कसम खाई कि वह जीवन (life) में और कभी युद्ध नहीं करेगा।

उस घटना के बाद सम्राट अशोक (Samrat Ashoka) नें शांति का मार्ग चुना और पुरे विश्व भर में बौद्ध धर्म (budh dharma) और विचारों का जोर-शोर से प्रचार किया। Samrat Ashok नें अफगानिस्तान, सीरिया, पर्शिया, ग्रीस, इटली, थाईलैंड, वियतनाम (vietnam), नेपाल, भूटान, मंगोलिया, चाइना (china), कंबोडिया, लाओस और बर्मा में भी बौद्ध धर्म (budha dharma) का प्रचार किया।

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सम्राट अशोक की उपलब्धियाँ Achievements of Samrat Ashok in Hindi

कहा जाता है दक्षिण एशिया (south asia) और मध्य एशिया में सम्राट अशोक (Samrat Ashoka) नें भगवान बुद्ध के अवशेषों को संग्रह करके रखने के लिए कुल 84000 स्तूप (stoop) बनवाएं।

उसके “अशोक चक्र” जिसको धर्म (religion) का चक्र भी कहा जाता था, आज के भारत के तिरंगा (tiranga) के मध्य में मौजूद है।

मौर्य साम्राज्य (maurya samrajya) के सभी बॉर्डर में 40-50 फीट ऊँचा. अशोक स्तम्भ अशोक (Samrat Ashoka) द्वारा स्थापित किया गया है।

अशोक (ashoka) नें चार आगे पीछे एक साथ खड़े सिंह का मूर्ति (Lion Capital of Samrat Ashoka) भी बनवाया था जो की आज के दिन भारत (india) का राजकीय प्रतिक हैं। आप इस मूर्ति को भारत (india) के सारनाथ मुसियम में देख सकते हैं।

सम्राट अशोक का इतिहास | Samrat Ashok History In Hindi

सम्राट अशोक (Samrat Ashoka) हमारे देश के महान शासकों में एक था। वह मगध के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (chandrahupt maurya) का पौत्र और बिंदुसार का पुत्र था। उसकी माता (mother) का नाम सुभद्रांगी था, जो चंपकनगर के एक गरीब माता – पिता की पुत्री (daughter) थी।

बचपन में अशोक बहुत चुस्त और शरारती प्रवृत्ति का बालक था । उस समय शिकार खेलना राजाओं और राजकुमारों का प्रिय खेल था । अशोक भी बचपन से शिकार खेलने में बहुत रुचि लेने लगा था । धीरे-धीरे वह शिकार में पूरी तरह निपुण हो गया। कुछ बड़ा होने पर उसने अपने पिता बिंदुसार के साथ प्रशासन के कार्यों में हाथ बंटाना शुरू कर दिया ।

वह अत्यंत साहसी और बहादुर राजकुमार था । प्रशासन के कार्यों में सहयोग करते समय वह राज्य की प्रजा के कल्याण का सदैव ध्यान रखता था । उसके इन गुणों से प्रभावित होकर प्रजा भी उसे बहुत चाहने लगी । बिंदुसार ने भी उसकी योग्यताओं को पहचान लिया था। अतः उसने अशोक को अवंति का शासक बना दिया। उस समय अशोक की आयु बहुत कम थी।

उज्जैन नगरी अवंती की राजधानी थी। वह नगरी उस समय ज्ञान और कला का केंद्र मानी जाती थी। अवंति का शासन संभालने के बाद अशोक एक कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में उभरने लगा। उसी दौरान उसने विदिशा नगर के एक व्यापारी की अत्यंत सुंदर पुत्री शाक्य कुमारी से विवाह रचा लिया। विवाह के कुछ समय पश्चात शाक्य कुमारी ने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को जन्म दिया।

अशोक अत्यंत कुशलतापूर्वक शासन का कार्यभार देख रहा था । वह सदैव अपनी प्रजा की भलाई चाहता था। प्रजा की भलाई के लिए उसने अनेक कार्य किए । उसकी वीरता , साहस, बुद्धिमानी और न्यायप्रियतासे प्रजा बहुत खुश व संतुष्ट थी।

अशोक का एक बड़ा भाई भी था , जिसका नाम सुशीमा था। बिंदुसार ने उसे तक्षशिला का शासक बनाया था , परंतु वह एक अयोग्य शासक सिद्ध हुआ । उसकी नीतियों से तक्षशिला की प्रजा संतुष्ट नहीं थी । अतः सारी प्रजा ने एक साथ मिलकर मगध शासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया ।

सुशीमा उस विद्रोह को दबाने में विफल रहा।अंततः बिंदुसार ने अशोक को तक्षशिला भेजा। उस समय अशोक के पास सैनिक शक्ति तो अधिक नहीं थी , लेकिन पिता का आदेश पाकर वह विद्रोह को कुचलने के लिए तुरंत तक्षशिला रवाना हो गया।

वहां उसके पहुंचने पर एक विचित्र घटना घटी। वहां की प्रजा ने अशोक के साथ लड़ाई करने के बजाए दिल खोलकर उसका स्वागत किया । सारी प्रजा उसके सामने एकत्र होकर कहने लगी, “हमें सम्राट बिंदुसार या राज परिवार से कोई शत्रुता नहीं है । हमारे विद्रोह के जिम्मेदार राज के दुष्ट और स्वार्थी मंत्री हैं । हम विद्रोही नहीं हैं।कृपया हमें क्षमा कर दीजिए।”

अशोक पूरी स्थिति को समझ गया। कुछ दिनों तक तक्षशिला में रहकर उसने विद्रोह के लिए जिम्मेदार मंत्रियों और पदाधिकारियों को दंडित किया । उसके बाद वह राज्य में शांति स्थापना के प्रयास में जुट गया। पूरी तरह शांति स्थापित करने के बाद वह अवंती वापस लौट आया।

धीरे-धीरे समय व्यतीत होता गया। अब राजा बिंदुसार काफी वृद्ध हो चुके थे । उनका शरीर दिनों दिन छीन होता जा रहा था। उन्होंने मगध साम्राज्य की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अपने प्रधानमंत्री राधा गुप्त और अन्य मंत्रियों से विचार विमर्श किया। प्रथा के अनुसार , बिंदुसार के बाद मगध के सिंहासन पर उस के बड़े पुत्र सुशीमा का उत्तराधिकार बनता था; परंतु तक्षशिला के विद्रोह के कारण सुशीमा की अयोग्यता प्रकट हो चुकी थी। अतः मंत्रियों ने विचार किया कि यदि सुशीमा को मगध के सिंहासन पर बैठाया गया तो पूरे साम्राज्य में अन्याय, अशांति और अत्याचार का वातावरण उत्पन्न हो सकता है।

अंत में मंत्री परिषद के परामर्श से बिंदुसार ने गुप्त रूप से संदेश भेज कर अपने छोटे पुत्र अशोक को मगध बुलवा लिया।

ईस्वी पूर्व 272 में बिंदुसार की मृत्यु हो गई । उसने मगध साम्राज्य पर 25 वर्षों तक सफलतापूर्वक शासन किया था। उसकी मृत्यु के बाद मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में अशोक को युवराज घोषित किया गया । बाद में ईस्वी पूर्व 268 मैं बड़ी धूमधाम से उसका राज्याभिषेक हुआ। पाटलिपुत्र के नागरिक अपने प्रिय शासक को सम्राट के रूप में देखकर आनंद से भर गए । चारों ओर उत्सव मनाया जाने लगा।

अशोक योग्य शासक की तरह कुशलतापूर्वक मगध पर शासन करने लगा। उसकी मंत्री परिषद के सभी मंत्री और अन्य पदाधिकारी योग्य और कर्तव्यनिष्ठ थे । अतः पूरे साम्राज्य में शांति और समृद्धि व्याप्त थी।

राजा बनते ही अशोक ने अपने साम्राज्य का विस्तार करना शुरू कर दिया । धीरे-धीरे उसने आस – पास का बहुत बड़ा क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिया । अब वह एक विशाल साम्राज्य का शासक बन चुका था ।

मगध के समीप ही एक राज्य था कलिंग , जिसे वर्तमान में ‘उड़ीसा’ के नाम से जाना जाता है । कलिंग अब तक एक स्वतंत्र राज्य था ।उसने अशोक की अधीनता अस्वीकार कर दी थी । कलिंग पर विजय का संकल्प लेकर अशोक ने अपनी विशाल सेना के साथ उस पर आक्रमण कर दिया ।

कलिंग के बहादुर सैनिकों ने भी उसका डटकर मुकाबला किया । दोनों सेनाओं मैं भयंकर युद्ध हुआ । दोनों ओर के असंख्य सैनिक, हाथी, घोड़े आदि युद्ध भूमि में हताहत हुए । अंततः कलिंग की छोटी सी सेना मगध की विशाल सेना के सामने टिक न सकी। वह बुरी तरह पराजित हुई।

अशोक ने कलिंग पर विजय प्राप्त करके उसे अपने अधिकार में तो कर लिया , परंतु युद्ध में कलिंग के 100000 से भी अधिक बंदी सैनिकों और लगभग इतने ही

हताहत सैनिकों तथा हाथी-घोड़ों के क्षत-विक्षत शवों को देखकर अशोक का हृदय करुणार्द्र हो गया । उसे विजय की प्रसन्नता नहीं हुई ,बल्कि इतने भयंकर रक्त पात से असह्य दु:ख हुआ ।उसने प्रतिज्ञा की कि अब वह कोई युद्ध नहीं करेगा।

वह अपनी संपूर्ण सैनिक शक्तियों के साथ धर्म के सम्मुख नतमस्तक हो गया । उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और अहिंसा का पालन करते हुए विशाल मगध साम्राज्य पर शासन करता रहा । अशोक को ‘देवानांप्रिय’ और ‘प्रियदर्शी’ भी कहा जाता था।

उसने अपने एक शिलालेख मैं लिखवाया था, ‘धर्म की विजय में प्रेम और सौहार्द होता है । देवानांप्रिय का विश्वास है कि धर्म की विजय से प्राप्त किया गया प्रेम और सौहार्द इस लोक के लिए भले ही थोड़ा हो , परंतु परलोक में इसका पर्याप्त लाभ मिलता है।’

कलिंग युद्ध के भयानक दृश्य को देखकर अशोक का हृदय आहत हो गया था। बौद्ध धर्म की शिक्षाओं से उसे मानसिक शांति मिली। बुद्ध के एक विषय उपगुप्त ने उसे बौद्ध धर्म में दीक्षित किया ।

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उसके बाद अशोक का हृदय प्रेम और अहिंसा की भावना से भर गया । उसने शिकार करना और मांस खाना भी बंद कर दिया। इस प्रकार वह पूरी तरह सदाचारी एवं अहिंसात्मक जीवन व्यतीत करने लगा । उसने अपनी प्रजा को भी इसी तरह सदाचारी जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया । अपनी प्रजा को संबोधित करते हुए उसने कहा, प्रत्येक व्यक्ति को सत्य, न्याय और प्रेम का जीवन व्यतीत करना चाहिए। जानवरों के प्रति भी दया भाव रखना चाहिए। सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि उन सभी की शिक्षाएं समान हैं।’

सम्राट अशोक अपनी प्रजा के कल्याण की ही नहीं ,बल्कि समस्त मानव – जाति के कल्याण की कामना करता था। वह अपने शुद्ध विचारों और महान कार्यों से लोगों का दिल जीतना चाहता था। इसके लिए उसने अपनी संपूर्ण शक्तियां अपनी प्रजा के लिए समर्पित कर दी।

बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रचार करने के लिए अशोक बौद्ध भिक्षु बन गया और विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए लोगों को उपदेश देने लगा । इस दौरान उसने विभिन्न धर्मों के अनुयायियों से धर्म के संबंध में चर्चा की और श्रेष्ठ लोगों को उपहार भी दिए ।

वह चाहता था कि बौद्ध धर्म की शिक्षा पूरे विश्व में पहुंचे , ताकि समस्त मानव – जाति का कल्याण हो । उसने अपने देश में शिलालेखों में धार्मिक संदेश लिखवाएं , जिससे अधिक से अधिक लोग उन्हें ग्रहण कर उनसे लाभ उठा सकें ।अशोक के ऐसेशिलालेख मध्य प्रदेश , गुजरात ,उड़ीसा, महाराष्ट्र ,आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के अतिरिक्त पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल के कुछ स्थानों पर ही पाए गए हैं।

हमारे देश का इतिहास ऐसी अनेक शासकों की गाथाओं से भरा पड़ा है , जिन्होंने अपनी विजय ,साम्राज्य विस्तार, न्यायप्रियता और निर्धनों की सहायता से संबंधित सूचनाएं अपने स्तंभों द्वारा अथवा शिलालेखों में लिखवाई हैं ; परंतु अशोक ही एक ऐसा शासक हुआ है, जिसने अपने स्तंभों और शिलालेखों मैं खुदे धर्म – संदेशों से समस्त मानव – जाति के लिए जीवन . ज्ञान का प्रकाश फैलाया है।

कुछ समय पश्चात बौद्ध धर्म के अनुयायियों में आपस में मतभेद हो गया । इससे अशोक बहुत दुखी हुआ । उसने सभी बौद्ध भिक्षुओ की एक सभा पाटलिपुत्र में आयोजित की। लंबे विचार – विमर्श के बाद बौद्ध भिक्षु का मतभेद दूर हो सका । इससे उत्साहित होकर अशोक नई उर्जा के साथ बौद्ध धर्म के प्रचार में लग गया।

उसने सीरिया , मिश्र , मकदूनिया , वर्मा और कश्मीर में बौद्ध उपदेशक भेजे। उसने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए सीलोन (श्रीलंका ) भेजा।अपने शासन के 20वें वर्ष में अशोक अपनी पुत्री संघमित्रा और धर्मगुरु उपगुप्त के साथ पुनः बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए निकल पड़ा । इस भ्रमण के दौरान वह वैशाली और महात्मा बुद्ध से संबंधित अन्य स्थानों पर गया। वैशाली से वह पूर्व में रामग्राम पहुंचा । उसके बाद उसने लुंबिनी, कपिलवस्तु ,श्रावस्ती और गया होते हुए विभिन्न पवित्र स्थानों का भ्रमण किया । अपनी इस यात्रा के क्रम में वह जहां – जहां भी गया वहां – वहां उसने स्मृति के रूप में स्तंभ और स्तूप बनाए।

इसी प्रकार का एक स्मारक – स्तंभ उसने सारनाथ में भी बनवाया था , जिसमें पत्थर के 50 फीट ऊंचे एक स्तंभ की चोटी पर चार खड़े शेरों की आकृति खुदी हुई है । इसी आकृति को वर्तमान में भारत के राजकीय चिन्ह के रूप में अपनाया गया है । हमारे राष्ट्रीय ध्वज में 24 तीलियों वाला जो चक्र दिखाई देता है , वह भी अशोक के उस स्तंभ से ही लिया गया है।

कहा जाता है कि अशोक ने कुल 84000 स्तूप बनाए थे ,जिसमें सांची का स्तूप सबसे प्रसिद्ध और शानदार है।इसके अतिरिक्त अशोक ने अनेक विश्राम- गृह और बौद्ध बिहार भी बनाए । ये सभी अशोक के उपदेशों को तो प्रदर्शित करते ही हैं , उस काल की उत्कृष्ट वास्तु कला का नमूना भी प्रस्तुत करते हैं।

सम्राट अशोक का जीवन परिचय का साम्राज्य बहुत विशाल था। उसके साम्राज्य के अंतर्गत भारत अफगानिस्तान और बलूचिस्तान का एक वृहद भाग और नेपाल तथा बंगाल , बिहार आंध्र प्रदेश और वर्तमान कर्नाटक राज्य का अधिकार क्षेत्र आता था। इन स्थानों पर पाए गए शिलालेखों से यह जानकारी मिलती है।

यद्यपि अशोक ने अपने इस विशाल साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में बनाई थी, लेकिन शासन की सुविधा के लिए उसने पूरे साम्राज्य को चार भागों में विभाजित कर रखा था- मालवा ,पंजाब, दक्षिणापथ और कलिंग इन चारों भागों की राजधानी क्रमशः तक्षशिला उज्जैन , स्वर्ण नगरी और कौशल में बनाई थी । प्रत्येक प्रांत में उसने एक – एक प्रतिनिधि की नियुक्ति की थी , जो अपने – अपने प्रांत में स्वतंत्र रूप से शासन- कार्य संभालता था।

अशोक का मानना था कि प्रजा की समृद्धि ही वास्तव में राजा की समृद्धि होती है । अपनी प्रजा की वास्तविक स्थिति की जानकारी प्राप्त करने के लिए उसने कई अधिकारी नियुक्त किए थे , जो प्रजा के दु:ख – सुख के बारे में उसे सूचना देते थे । अशोक की ओर से इन अधिकारियों को पूरी छूट थी कि वह किसी भी समय प्रजा के संबंध में कोई महत्वपूर्ण सूचना देने के लिए उसके पास आ सकते थे।

अशोक (Samrat Ashoka) का आदेश था , ‘मैं भोजन कर रहा हूं ,अपने व्यक्तिगत कक्ष में हूं , सोया हुआ हूं अथवा किसी कार्य में संलग्न हूं , यात्रा पर निकल रहा हूं या विश्राम कर रहा हूं –

मैं कहीं भी और किसी भी स्थिति में हूं , प्रजा के संबंध में सूचना देने के लिए नियुक्त किए गए अधिकारी मुझसे संपर्क स्थापित कर सकते हैं ।’

अशोक (Samrat Ashoka) के इन शब्दों से पता चलता है कि उसे अपनी प्रजा की भलाई की कितनी चिंता रहती थी।

अशोक (Samrat Ashoka) ने अपने राज्य – प्रतिनिधियों को भी आदेश दिया था , ‘हमने आपको हजारों लोगों का प्रभारी नियुक्त किया है । आप लोग उन सभी लोगों का प्यार और सम्मान अर्जित करें । प्रत्येक स्थिति में उन लोगों के साथ समान व्यवहार करें । निष्पक्ष रुप से कार्य करें । क्रोध, घृणा,धृष्टता और आलस्य का त्याग कर सक्रिय होकर प्रजा की भलाई का कार्य करें।’

वास्तव में अशोक (Samrat Ashoka) अपनी प्रजा को अपनी संतान की तरह ही चाहता था । उसका कहना था, ‘जिस प्रकार एक मां अपने बच्चे के लिए एक योग्य आया का चुनाव इस विश्वास के साथ करती है कि वह उसके बच्चे का अच्छे ढंग से पालन – पोषण करेगी , ठीक उसी प्रकार मैंने अपनी प्रजा की देखभाल के लिए प्रतिनिधि नियुक्त किए हैं।’

शिक्षा के प्रसार के लिए भी अशोक ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए । उसके शासन काल में शिक्षा और धर्म के अतिरिक्त व्यापार के क्षेत्र में भी बहुत विकास हुआ । वहां के लोगों ने समुद्री मार्गों द्वारा विदेशों से भी व्यापारिक संबंध स्थापित किए थे । अशोक ने कृषि , वाणिज्य , उद्योग आदि के क्षेत्र में विकास के लिए भी अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। किसानों को सिंचाई की सुविधा प्रदान करने के लिए उसने नहरें तथा कुएं खुदवाए।

उद्योग तथा व्यापार को बढ़ावा देने के लिए अशोक ने बड़ी-बड़ी सड़कें बनवाई । उन सड़कों के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाए । राज्य के सभी लोगों और यहां तक कि जानवरों के लिए भी मुफ्त चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध करवाई।

सम्राट अशोक का जीवन परिचय (Samrat Ashoka) के एक अभिलेख से उसकी इच्छा के बारे में पता चलता है कि उसे उसके साम्राज्य के अंतर्गत जंगलों में रहने वाले जानवर ही शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करें।

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अशोक (Samrat Ashoka) के राज्य में चारों ओर न्याय धर्म और नीति का वातावरण था। समाज में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं था । अशोक स्वयं लोगों को उपदेश देता था कि वे धर्म का पालन करते हुए प्रसन्नता पूर्वक जीवन व्यतीत करें। नियमित रूप से सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया जाता था , जिसमें समाज के सभी लोग समान रुप से भाग ले सकते थे । उनमें जाति , धर्म , संप्रदाय अथवा ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं होता था।

जीवन भर प्रजा के कल्याण के लिए कार्य करता हुआ अशोक धीरे-धीरे वृद्धावस्था में पहुंचने लगा । दुर्भाग्य से इस अवस्था में उसे परिवार के कुछ सदस्यों की ओर से मानसिक कष्ट का सामना करना पड़ा । उसने अपने पुत्रों महेंद्र ,कुणाल और तिवाल को बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए नियुक्त कर दिया था।

इधर अशोक के पौत्रों – दशरथ और संपत्ति में उत्तराधिकार को लेकर विवाद होने लगा । रानियों के मध्य भी इसमें मामले पर विवाद चल रहा था । अशोक राजसी वैभव त्यागकर एक भिक्षु के रूप में साधारण जीवन व्यतीत कर रहा था। उसकी एक रानी तिष्यरक्षित अशोक की इस नीति के विरुद्ध थीं । वह राजसी वैभव से पूर्ण जीवन पसंद करती थी । इन सभी कारणों से अशोक दुखी रहने लगा था।

अशोक (Samrat Ashoka) के जीवन के अंतिम 10 वर्षों और उसकी मृत्यु के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है । कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जीवन के अंतिम वर्षों में अशोक हतोत्साहित होकर जीवन व्यतीत कर रहा था। मानसिक शांति की खोज में वह अपने गुरु उपगुप्त के साथ तीर्थ यात्रा पर निकल गया था ।अंत में वह तक्षशिला पहुंचा । वहां कुछ दिन रहने के बाद उसकी मृत्यु हो गई।

सम्राट अशोक का जीवन परिचय (Samrat Ashoka) ने लगभग 37 वर्षों तक मगध साम्राज्य पर शासन किया । इतने विशाल साम्राज्य का शासक होते हुए भी उसने एक भिक्षु के रूप में अपना जीवन व्यतीत किया। इस प्रकार वह एक महान सम्राट होने के साथ-साथ महान उपदेशक भी था । मानव इतिहास में वस्तुतः वह एक अद्वितीय सम्राट था।

अशोक (Samrat Ashoka) के एक शिलालेख में लिखा हुआ मिला है – ‘सभी लोग मेरी संताने हैं । मैं उनके पिता के समान हूं।जिस प्रकार सभी पिता अपनी संतान की भलाई और उसकी प्रसन्नता की इच्छा रखते हैं , उसी प्रकार मैं अपने सभी लोगों की प्रसन्नता की कामना करता हूं।’

अशोक (Samrat Ashoka) यद्यपि आज से लगभग 2300 वर्ष पूर्व संपूर्ण भारत का शासक था , परंतु उसकी महानता के कारण आज भी हम उसे सम्मान पूर्वक याद करते हैं।

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