मान सम्मान – Sant Tukaram aur Raja ki Kahani
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मान सम्मान – Sant Tukaram aur Raja ki Kahani

मान सम्मान – Sant Tukaram aur Raja ki Kahani

सन्त तुकाराम अपने समय के बहुत पहुँचे हुए भक्त थे। शिवाजी महाराज उनका बड़ा सम्मान करते थे। एक बार उन्होंने सन्त तुकाराम का सम्मान करने के लिए पालकी, घुड़सवार और पैदल सैनिक भेजे और सन्देशा भिजवाया कि ये सब आपकी सेवा में उपस्थित हैं, कृपया दरबार में पधारें। (Sant Tukaram aur Raja ki Kahani)

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तुकाराम जी उस समय पूजा कर रहे थे। उन्होंने आँखें खोल कर देखा पालकी को, सैनिकों को । कोई उत्तर नहीं दिया; बस, आँखें बन्द करके रोने लगे। रो-रो कर भगवान से कहने लगे-“तुम यह फल दोगे मेरी भक्ति का? तुम चाहते हो कि मान-सम्मान पा कर मैं तुम्हें भूल जाऊँ

और तुम्हें मुझसे छुटकारा मिल जाये? मैं ऐसा-वैसा भक्त नहीं हैं। मैं इस मान-सम्मान को ठुकरा दूंगा, तुम्हारे पैर पकड़ कर बैठ जाऊँगा और तब तक नहीं छोडूंगा, जब तक तुम मुझे अपना नहीं लोगे।”

क्यों रोये तुकाराम जी? शिवाजी महाराज ने इतना बड़ा सम्मान दिया, परन्त वह फिर भी रोये। इसलिए कि मान-सम्मान पा कर इनसान उसी में डूब जाता है और समझता है कि मुझे सब-कुछ मिल गया। वह भगवान को भूल जाता है, अपने कर्तव्यों को भूल जाता है।

मान-सम्मान देने के लिए होता है, लेने के लिए नहीं। दूसरों को जी-भर कर सम्मान देना। जब तुम्हें सम्मान मिले तो सोचना-मान-सम्मान एक धोखा है, झूठ है, फरेब है। यह एक जाल है जिसमें फँसने के बाद निकलना बहुत कठिन होता है।

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